बेसब्र सी निगाहों में इंतज़ार ढूंढते हो, हमे छोड़ कर सब में इतवार ढूंढते हो!
अजब ये रीत है किसी को याद करने की, जिंदा को जला मुर्दों में संसार ढूंढते हो!
सफ़ेदियों में तर होकर भी चाह तो वही है, गर्मियों के दिनो में जाड़े का बीमार ढूंढते हो!
तुम तो हो चुके माहिर अपने इस हुनर में, न अब सिर देखते हो, न कटार ढूंढते हो!
