तीक्ष्ण कुटिल कटार वार से,
जन्मे जो ये घाव अघाव से,
इनको पलने दो बढ़ने दो,
चिंगारी तिल तिल जलने दो!
पुष्प पन्थ सुख सेज कहाँ,
विपलव को आराम कहाँ,
जब तक जीवन का रण हो,
घावों पर मिट्टी मलने दो!
चिंगारी तिल तिल जलने दो!
जब पीड़ हृदय में धधक उठे,
सिंधु की छाती में ज्वार उठे,
चट्टानों को चीर उठेगी आग,
इन लपटों को बढ़ने दो!
चिंगारी तिल तिल जलने दो!
हो क्रांति की ये आग अमर,
दुर्ग अजेय हो दीप्ति अजर,
इसके कदमो पीड़ित जन के
संतापों को दलने दो!
चिंगारी तिल तिल जलने दो!