आज्ञा दे ओ माँ मुझको मैं भी जोगी बन जाऊं,
हाथो में ले पीच्छी कमण्डल तेरे द्वार से जाऊं!
नग्न शरीर पर श्वेत वस्त्र रख वीर पुकारे जाऊं,
बहते जल के जैसे मैं भी दुनिया में बहता जाऊं!
बन्धन तज संसारी सारे आतम से प्रीत लगाऊँ,
जिधर कहीं अरिहंत रहे मैं उधर ही धूमि रमाऊं!
अंत समय ये मैली काया संथारा कर धो जाऊं,
जाते जाते तेरे चरणों की धूलि को शीश लगाऊँ!