ताकता हूं रंगीन सितारों को जमीन पर ।

फिर आसमान क्यों बताते हैं यह लोग ।।


मोहब्बत मुकमल नही होती गर्ग ।

फिर क्यों लब्ज़ चुराते हैं यह लोग ।।


गाली देकर रोने लग जाते हैं यह लोग ।

कितने मीठे होते हैं यह खारे लोग ।।


छाछ/दही से दूध बनाते हैं यह लोग ।

फिर घी का भाव क्यों पूछते हैं यह लोग ।।


बचपन की यादों से छूट जाते है यह लोग ।

कितने अल्फाजों में बयां होते हैं यह लोग ।।


दरिया दिल का समुंदर से भी तेज चल रहा है ।

फिर क्यों अश्क से तसल्ली दे जाते हैं यह लोग ।।


बैठे हैं रुप,सौंदर्य,चरित्र से माने हुए है यह लोग ।

फिर क्यों तिनके का प्रमाण बताते हैं यह लोग ।।


हवस और जिस्म के अभिलाषी बनकर बैठे हैं यह लोग ।

फिर क्यों बातों में स्वयं को विद्वान बताते हैं यह लोग ।।



भारमल गर्ग सांचौर

जालोर (राजस्थान)

8890370911

bhamugarg@gmail.com