ए री प्रीतम, कब सुनोगे तुम ये मेरे गीत?
बिन तेरे मेरा मन है उजड़ा, बाँसुरी-सा बिखरा चीत।
नींदों में तेरे नाम की धुन, आँखों में बसी है रात,
विरह के अंधियारे में मैं, खोई हूँ तेरी बात!
ये सूनी रजनी, ये टूटे सपने, दीवारों पे छाया तेरा साया,
हर चादर में उलझी है तस्वीर, हवा भी तेरा इशारा लाया।
दरवाज़े पे कोई नहीं आता, बस पुकारती हूँ मैं तेरा नाम,
विरह की इस अग्नि में जलकर, बन गई हूँ मैं एक शाम!


