
क्यूँ ये मज़दूर इतने मजबूर हो गए है,
जो हमारे घर बनाते है वो अपने घरों दूर हो गए हैं,
हम बैठे चार दीवारी में मशगूल अपने घरबार में,
ये भटक रहे है रास्तें पटरियों पर,है मदद के इंतज़ार में|
ना खाना है ना पानी है,बीवी बच्चो कि जिम्मेदारी है,
जेब में कौड़ी फूटी नहीं,बस चलते रहने की बेचारी है,
सरकार के बस वादें है,लोगों कि है बस सांत्वना,
वादों से पेट भरता नहीं,ना सान्त्वनाऐ द
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