क्यूँ ये मज़दूर इतने मजबूर हो गए है,
जो हमारे घर बनाते है वो अपने घरों दूर हो गए हैं,
हम बैठे चार दीवारी में मशगूल अपने घरबार में,
ये भटक रहे है रास्तें पटरियों पर,है मदद के इंतज़ार में|
ना खाना है ना पानी है,बीवी बच्चो कि जिम्मेदारी है,
जेब में कौड़ी फूटी नहीं,बस चलते रहने की बेचारी है,
सरकार के बस वादें है,लोगों कि है बस सांत्वना,
वादों से पेट भरता नहीं,ना सान्त्वनाऐ दे सकती है पन्हा|
अगर मजहबों से फर्क पड़ता है,तो हिन्दू भी इनमे शामिल है,
बनजाएगा मुस्लिम भी काफिर अगर इस शर्त पे मदद उसे हासिल है,
ये मज़दूर है, इन्हे फर्क बस भूक से पड़ता है,
खेल धर्म का इन्होने ना खेला,बस रोजी से इनका घर चलता है|
पहोचा दो इन्हे घर के द्वारे,
और कुछ ना तुमसे ये मंगाते है,
ये पहली बार हाथ फैला रहे है,
क्यू के घर पोहोचने की अहमियत ये जानते है|


