ग़ज़ल
जीने का अब कोई अरमान नहीं रहा,
मगर अपनों का ख़याल है, इसलिए जा नहीं सकता।
हर रोज़ टूटता हूँ ख़ामोशी की ओट में,
फिर भी उन्हें रुलाकर ख़ुद को मिटा नहीं सकता।
दिल थक चुका है दर्द का सफ़र निभाते-निभाते,
मगर उनकी मोहब्बत का क़र्ज़ भुला नहीं सकता।
शायद किसी सुबह फिर उजाला दस्तक दे,
इसी उम्मीद में अभी हार मान नहीं सकता।
