हाँ मत करो बात मुझसे
तुम्हारी मर्जी।
अपनों को क्या देना पड़े
बार-बार माफी की अर्जी
हाँ मानता हूं मैं हो जाती है गलतियां अक्सर
इंसान हैं हम खुदा तो नहीं।
जरा सी बात पर इतने दिन तक रूठे रहना
ऐसी भी क्या हो खुदगर्जी
हाँ मत करो बात मुझसे
तुम्हारी मर्जी।
एक पल में ही भूल गए
तुम वो सारी बातें
वो कसमे-वादे
वो सब मुलाकातें।
तुमको क्या है
तुम्हारे लिए तो है
ये सारी बातें फर्जी
कर लो तुम भी जितनी
करनी है तुमको मनमर्जी
हाँ मत करो बात मुझसे
तुम्हारी मर्जी।
बार-बार तुम रूठो
बार-बार मैं मनाता रहूं
अब कितनी बार मैं
ये किस्सा दोहराता रहूं।
सुनो अगर मैं रूठ गया ना
तो तुम लिखते ही रह जाओगे अर्जी।
बहुत हो गयी तुम्हारी मनमर्जी,
अब देखना तुम भी मेरी खुदगर्जी
हाँ मत करो बात मुझसे
तुम्हारी मर्जी।


