तेरी भूल को भूल न बुलाए कोई, सुबह को बदल मैंने शाम कर दिया, न करे इस क़दर कोई तेरे नाम को रुसवा, कमाया हर नाम मैंने तेरे नाम कर दिया। दर्द हँसे तो यूँ ही नासूर बन जाए, आदत ख़ुद ब ख़ुद कब दस्तूर बन जाए, रास्ते के सफ़र की बस इतनी सी दास्ताँ, हर मील के पत्थर को एक मुक़ाम कर दिया। साँस की उम्मीद पे ये ज़िंदगी क़ायम है, रात और दिन का बहुत पुराना मरासिम है, तू हमेशा अपने फ़लसफ़े में ज़िंदा रहे , तोड़कर ताबूत उसने सुंदर मकान कर दिया। सुना है दर और दीवारों के कान होते हैं, तभी तो खंडरो में बेहिसाब जज़्बात होते हैं, बची ख़ूची ज़िंदगी को अब शूकूँ से जीने के लिए मैंने अपना घर तोड़कर उसे मज़ार कर दिया । तेरी भूल को भूल न बुलाए कोई, सुबह को बदल मैंने शाम कर दिया, न करे इस क़दर कोई तेरे नाम को रुसवा, कमाया हर नाम मैंने तेरे नाम कर दिया।