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अँगने में मेरे

आज अँगने में मेरे किसी के नैनों की कुछ बौछारे पड़ी , बिन बारिश इस बंज़र जमीन पर  फिरसे कुछ खिलने की एक उम्मीद जगी , कुछ समंदर सा था उसकी आखों में जो इस जमीन को भी संग डुबो चली , ना जाने
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