अपने गुनाहों का दोषी मुझको बना दिया,
दुनिया तूने मुझे जिन्दगी से मिला दिया,
हम मानते थे हमेशा होती है सच की जीत,
दुनिया ने सिखाई पर हमें ये नई रीत,
सच - झूठ कुछ नहीं है, दुनिया है एक बाजार,
हर चीज है बिकाऊ, कीमत है कुछ हजार,
होते हैं फैसले यहाँ अपने हिसाब से,
हम सीखते ही रह गए बेचैन किताब से,
अपने गुनाहों का दोषी मुझको बना दिया,
दुनिया तूने मुझे हकीकत से मिला दिया,
हर कदम पर साथ थे जो वो आज दूर हैं,
हम आज समझ पाए कि कितने मजबूर हैं,
सब खुश हैं अपनी गलतियां मुझ पर डाल कर,
रख दीं हैं सारी खामियाँ मेरी निकाल कर,
मेरी अच्छाई में भी खामियां आने लगी नजर,
दुनिया ने अपनी निगाहें कुछ फेरीं इस कदर,
अपने गुनाहों का दोषी मुझको बना दिया,
दुनिया तूने मुझे जीना सिखा दिया,
अपने हुए पराये, औरों को क्या कहें,
समझ में नहीं आता, दुनिया में कैसे रहें,
चालबाज़ी और फरेब मुझे आता नहीं है,
ईमानदारी से यहाँ जिया जाता नहीं है,
जिम्मेदारियों का बोझ है, न मरना आसान है,
जीवन में मेरे भी तो कई अरमान हैं,
जी रहा हूँ मैं बस इसी इंतजार में,
होगा न्याय कभी मेरा तेरे दरबार में|
"बेचैन"
