
ज़रा ठहर के आना
जो इक वादा था तुमसे,
फ़िज़ा में खिलखिलाने का
कहकशाँ में डूब जाने का
जूड़े में तुम्हारे चाँद टिकाने का
उगते सूरज को सीने से लगाने का
जानां इस ख़्वाहिश में, थोड़ा वक़्त लगेगा
गुमाँ की आज़माइश में थोड़ा वक़्त लगेगा
कि ये दुनिया, ये मंज़र, ये शहरों में बंजर
अभी महफूज़ नहीं हसीं ख़्वाबों के लिए
कि, सड़क पे ख़ून के थक्के अभी सूखे नहीं हैं
सरिया लिए हाथ अब किताबों के भूखे नहीं हैं
मज़हबी टुकड़े पे पलते सायों को अभी
मुल्क में 'टुकड़े-टुकड़े' चलाने से फ़ुर्सत नहीं है
कि अभी तो नस्ल को साबित है करना
रहने को ज़िंदा अब ज़रूरी है डरना
कि कानून के मानी अभी बदल रहे हैं
हुक्मरां को इंक़लाबी अभी खल रहे हैं
मुझे मालूम है बड़ा मन था तुम्हारा,
जाड़े में, कुल्फ़ी का लुत्फ़ उठाने का
वादी में, कहवा के दो कप लड़ाने का
लालकिले पे बाँह फैलाने का, और
'डल' की झरझर में डूब जाने का
मगर जानां, अभी यहाँ,
तेल की खदानों पे मिसाइलों के घेरे हैं
बड़े काले से रोज़ यहाँ उठते सवेरे हैं
कुछ अंदर के कीड़े सरहद कुतर रहे हैं
