
फूल दिल तक़दीर में आए बहुत
पर हमें पत्थर के मन भाए बहुत //
पाँव के छालों से रक्खा राबता
राह के काँटें भी शरमाए बहुत //
बस यही इक बात हमको याद है
भूलकर तुझको यूँ पछताए बहुत //
जान लेकर भी शराफ़त देखिए
नुस्ख़े वो जीने के बतलाए बहुत //
नक़्श देखे रोज़ उसका इक वह
आइना अपने पे इतराए बहुत //
जब तवक़्क़ो ही नहीं इस ज़ीस्त
फिर हमें दुनिया क्यूँ समझाए बहुत //
साथ मेरे देख कर तुमको सभी
चेहरे कितनों के यूँ मुरझाए बहुत //
-प्रशान्त बेबार


