First nazm: Main 6 baras ka nanha baalak

मेरी अक्खड़ माँ,

जो मशहूर चित्रकार है

मुझे डाँट डाँट के,

हाथ पकड़ के

कागज़ पे लाइने खिंचवाती थी

मैं छह बरस का नन्हा बालक

एक लाइन भी सीधी सीधी

खींच नहीं कभी पाता था

वो यह देख रही थी,

सोच रही थी

टोक रही थी,

पल पल मुझको कोस रही थी

फ़िर अब वो गुमसुम गुमसुम

सुबक सुबक के मांग रही है

चुप्पी में भी डाँट रही है

शायद मुझसे कह रही है,

कि,

कुछ और टेढ़ी मेढ़ी

ऊंची नीची लाइनें

ECG पे काश,

मैं फिर से बना दूं,

मैं फिर से बना दूं।

मैं छह बरस का नन्हा बालक।।

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हम सब जो यूँ बढ़ रहे हैं

एक नए वक़्त में चल रहे हैं

आगे बढ़ने में माहिर हैं

कि हम सब एक मुसाफ़िर हैं ।


सिर्फ़ गली,शहर या राहों के नहीं

यूँ कि वक़्त की पगडंडी पे

भटक रहे हैं सय्यारे से

कुछ जीते से, कुछ हारे से


घड़ी के काँटों का अलग फ़साना

बस गोल गोल है चलते जाना

जो बीत गयीं सदियां वो मानो

जैसे छोड़ा शहर पुराना

एक मुसाफ़िर हार न माना

फिर नया साल है नया ठिकाना।


जैसे राही अपनी राह पकड़

बस शहर बदलता जाता है

वैसे ही ये शहर, 'साल' का

हर साल बदलता जाता है।


इन वक़्त के शहरों में

क़स्बे महीनों के नाम हैं

कहीं सर्दी की धूप है सेकी

कहीं गर्मी में खाये आम हैं।


जब इन महीने वाले कस्बों में

कोई हफ़्ते वाली गली आ जाए

तो नुक्कड़ पे खड़े ख़ड़े

हफ्तों का हाल पूछना

कितने हफ़्ते रोके काटे,

कितने ख़्वाब मिलके बाटें

इन सबका, हिसाब पूछना।


हर गली हर नुक्कड़ पे बसा

एक दिन नाम का घर होगा

एक आंगन जैसा लम्हा होगा

और चौका जैसा एक पल होगा ।


जैसे सारे कमरे एक जगह

आंगन में मिल जाते हैं

वैसे सब लम्हे इक दूजे के

कंधों पे टिक जाते हैं ।


तुम मुसाफ़िर चलते चलते

वक़्त के किसी शहर ठहर जाना

दिन नुमा घर के अंदर

किसी लम्हे में फिर रुक जाना

औऱ किसी लम्हे की दीवार पर

कान लगा, दास्ताँ सब सुन जाना ।


सुन ना कैसे हसीन याद कोई

गीले पैर ले छप छप करती आई थी

और कैसे कड़वी बातों ने

एक अर्थी वही उठाई थी।

एक तंग रसोई लम्हे में

तुम्हारे हौसले गुड़गुड़ाये थे

यहीं मुझे तुम छोड़ वक़्त के

दूजे शहर चले आये थे।


पर तुम्हें तो जाना ही था,

तुम मुसाफ़िर जो थे

एक मुसाफ़िर का फ़र्ज़ है

एक शहर से शहर दूसरे जाना

जैसे आख़िरी तारीख़ बदल जाना

मुसाफ़िर हो,जाओ बिल्कुल जाओ

नए शहर का जश्न मनाओ ।


नए साल का जश्न मनाना

पर सुनी दास्तान लम्हों की

फिर अगले मुसाफ़िर को सुनाना ।


कभी कभी जब वक़्त मिले

तो गए लम्हों की दास्तान सुनना ।

नए साल का जश्न करना

पर बीते शहर का एक ज़िक्र रखना

कभी कभी जब वक़्त मिले

तो बीते लम्हों की दास्तान सुनना ।


हम मुसाफ़िर हैं

आगे बढ़ने में माहिर हैं

हम सब मुसाफ़िर हैं ।