कभी कभी फ़ासलों से मुहब्बत रंग लाती है

उपवास के बाद जैसे प्यास बढ़ जाती है

कुछ चाहत, कुछ ज़रूरत, कुछ आदत सी है

रह-रह के दूरी इक दूजे की तड़प बताती है


- प्रशान्त बेबार