हौसले परवाज़ को तुम, उस गगन तक ले चलो
आख़िरी इक साँस है, बस उस चमन तक ले चलो //१
इस पराई छाँव में अब धूप लगती है यहाँ
रेत में घर है मिरा, मुझको वतन तक ले चलो //२
रफ़्ता-रफ़्ता दुनिया के, मिटने का कुछ एहसास है
जल्दी-जल्दी तुम मुझे, दर-ए-मिलन तक ले चलो //३
है बड़ी मुद्दत से हसरत, नाम उसका लिखने की
कोई इस शायर को माबद-ए-सुख़न तक ले चलो //४
हँसके फिर रूमाल से चेहरा छुपाना याद है
देखने की इस तलब को तुम कफ़न तक ले चलो //५
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