अंतर्मन की वाणी
चमक भरी बड़ी शैतान आंखें, मासूम सी एक नन्हीं जान
ख़ुदा की रहमत हो, या ख़ुद खुदा का छोटा रूप हो तुम
सारा दिन जो फ़िक्र ए दुनिया में बेहिसाब सर खपाता हूँ मैं
दौड़ के पास आ,सब वबालों से मुझे आज़ाद करती हो तुम।
रोज़ शाम जब मेरी बड़ी उंगली पकड़ सैर पे जाती हो
छोटे छोटे ल्वजों से कितनी बात बनाती हो
तितली को पकड़ो या गिलहरी के पीछे भागो,
उन सब में भी सबसे छोटी नज़र आती हो ।
ज़रा भी यक़ीन नहीं होता कि चार बरस हो गये यूँ,
उस रात को, जब हस्पताल में शहद ले बावला फ़िरा था मैं
तब से ज़िंदगी चाहे कितनी भी तन्हा क्यों न हो कभी,
उसे ख़ाली और मुझे कभी अकेला नहीं करतीं तुम।
जब भी हलवा चोरी का,तुम्हारी माँ से छुपके नहीं खाते हम दोनों
बड़ा फ़ीका फ़ीका लगता है, बेस्वाद हो मीठा जैसे
दौड़ने और खेलने में भी हारने का दुगना मज़ा आता है,
मेरी बेटी हो, बेटा हो या ज़िंदगी की जीवंत कहानी हो तुम।
कुछ भी हो, कैसी भी, मेरे अंतरमनः की वानी हो तुम।
मेरे अंतरमनः की वानी हो तुम ।।
~ प्रशान्त 'बेबार'


