ऐ वतन, मेरा ग़ुरूर है तू

ज़मीं से उठता ज़मीर है तू


तेरे सीने पे सियासत की

चाहें कितनी हों लकीरें

भाषा, मज़हब, रंग की

कितनी भी कड़ी ज़ंजीरें


दिल में मेरे, एक ही नाम है तू

ख़ुदा से भी न कम, कोई पैमान है तू


ऐ वतन, मेरा ग़ुरूर है तू

ज़मीं से उठता ज़मीर है तू ।


प्रशान्त 'बेबार'