क्यों करू तुझसे शिकवे गिले, तुझपे मुझे ऐतबार है

तेरी आंखो के आंसू मेरे आंखों से बहे, दुआ यही हर बार है


कलम में समाती नहीं ये तारीफ जैसे लफ्ज़ सब बेकार है

चाह हमेशा रूह की थी मुझे तेरे, जिस्म तो बस एक जरिया एक द्वार है


कहा वक़्त मुझे शक या हिसाब का, मोहब्बत इस कदर मूझपे सवार है

तेरी एक मुस्कान की खातिर, सब कुछ यहां न्योछार है


रूठने के खयाल से भी तू कतरा जाये, इतना बेशुमार मेरा प्यार है

लफ्जो के पीछे छुपता अदना सा शायर हू मै, कैसे माने के आशिक तेरा गुलज़ार है