वक़्त ने वो जुर्म देखो कर दिया
खुद की गुनाहों की सजा इसने हम सबके सर मढ़ दिया
कहने को तो ये खेलता है सभी के संग
इसने खेल में भी हम सबको आ के छल गया
कह रहा था ये वक़्त के मैं देर से हूँ आ रहा
झूठ का दिलासा देकर देखो कैसे आके तन गया
हमारे साथ के लम्हो को है ये ऐसे घूरता
हमें आज जाने की गम देके एक तमाचा जड़ गया
वक़्त की ही तो बात थी
ये कल की ही तो रात थी
वादा था इसने किया मैं थोड़ी देर से हूँ आऊंगा
अपने वादे तोड़ के देखो कैसे आके तन गया
मैंने लिखे थे पत्र एक वक़्त के साम्राज्य में
रात के स्वप्न में वक़्त भी था सो चुका
और सुबह एक भोर में वक़्त ही था ढल चुका।