बसंत गीत


आज बसंत की छायी लाली,

बागों में छायी खुशियाली, 

आज बसंत की छायी लाली॥


वृक्ष वृक्ष में आज एक नूतन है आभा आयी।

बीत गयी पतझड़ की उनकी वह दुखभरी रुलायी।

आज खुशी में झूम झूम मुसकाती डाली डाली।

आज बसंत की छायी लाली॥


इस बसंतने किये प्रदान हैं उनको नूतन पल्लव।

चहल पहल में बदल गया अब उनका जीवन नीरव।

गूँज रही है अब उन सब पर मधुकर की गूँजाली।

आज बसंत की छायी लाली॥


स्वर्णिम आभा छिटक रही आज रम्य अमराई में।

महक उठी बौरों से डालें बाला ज्यों तरुणाई में।

फिर कानों में मिश्री घोल रही कोयल मतवाली।

आज बसंत की छायी लाली॥


आज चाव में फूल रहे हैं पौधे वृक्ष लता हर।

बाग बगीचे सजा रहे मृदु आभा को बिखरा कर।

कैसी छायी दिग दिगंत में ये मोहक हरियाली।

आज बसंत की छायी लाली॥


मंद पवन के हल्के झोंके तन को करते सिहरित।

फूलों की मादक सौरभ है मन को करती मोहित।

श्रवणों में संगीत के स्वर दे पुर्वा पाली पाली।

आज बसंत की छायी लाली॥


बिखरा सुंदर नीलापन इस विस्तृत नभ मंडल में।

संध्या की लाली छायी फिर मोहक नील पटल में।

उस पर पक्षी चहक रहे हैं भर मन में खुशियाली।

आज बसंत की छायी लाली॥


आज जगत की सकल वस्तु में नव उमंग है छायी।

इस बसंत की खुशियां जा हर मन में आज समायी।

जिसकी रचना ऐसी फिर वह कितना सुंदर माली।

आज बसंत की छायी लाली॥


बासुदेव अग्रवाल 'नमन'

तिनसुकिया