# राजरोग
कल की ही तो बात है
गली कूचों ने जाना भर था
दरख़्तों ने भी बस पहचाना था
पगडंडियों ने छापे थे निशाँ,भापा था वक़्त ।
कोई नया हमराह आया है
देखकर मुस्कुराया नहीं है अभी
पर लगा है दिलों में बसने
बातें अलग हैं, अलग है अदा ।
तो फिर अनायास
किस्सगाओं के झुंड में
ये अफ़वाह किसने फैलायीं?
सच क्या है?
कौन जानता है?
ना तुम, ना मैं
डॉक्टर तुम भी तो इंसान ही हो
हमारी तरह, हाड़ माँस के बने
फिर, इतनी संवेदनहीनता कैसे!
सच डॉक्टर, मुझे नफ़रत है
तुमसे और इस सफ़ेद चोले से
एक चलते फिरते आदमी पे
संदेह की चादर डाल देते हो
छिन लेते हो विश्वास
छोड़ देते हो अकेला, निसाहय !
सिर्फ़ दवाओं के भरोसे?
दवाओं से भला कोई जीता हैं?
ये तो ख़ुद बेजान है
ये क्या ख़ाक किसी को
जीवन देगी।
मैं जानता हुँ किस्सगाओं का झुंड जानता है
सारी बातें झूठी है, बेमानी हैं
मिलने लगोगी तुम, हँसने लगोगी तुम
देखने लगोगी सपने, भरने लगोगी रंग।
ना डरना, ना टूटना
कमतर ना करना आस
हिम्मत का है खेल सारा
जीना ही है, जीवन का सार।
# मेरी एक सहकर्मी, जो अभी युवा है, अभी अभी नौकरी शुरू की है, उसके राजरोग( ब्रेस्ट कैन्सर) से ग्रसित होने की ख़बर पे।


