अब मैं डरने लगा हूँ

कई कई बार 

टूट जाती है नींद मेरी

दो बच्चे

एक बीबी

और

एक अदद नौकरी

यही कूल जोड़ पाया हूँ अब तक

कल तक ख़ुशहाल था 

मैं भी औरों की ही तरह

पर आज डरने लगा हूँ

सोचता हूँ

अगर नौकरी चली गयी तो

क्या करूँगा मैं

कैसे दे पाउँगा किराया

कहाँ से भरूँगा फ़ीस

अगर लौटना पड़ा गाँव

तो कैसे लौटूँगा

चलो मैं तो काट ले जाऊँगा

मैंने मुफ़लिसी के दिन देखे है

जब पॉकेट में कुछ ना होता था

कैसे गुज़रे थे वो दिन

अब भी मुझे याद है

वैसे कभी भूला भी नहीं मैं

पर बच्चेइनको कैसे समझाऊँगा

इनके हाथों में क्या

पैरों में कभी छालें नहीं पड़े

कैसे तय कर पाएँगे इतना लम्बा सफ़र

बिन साधन चलना संभव ना होगा इनसे

फिर रास्ते की धूप और भूख

ये दोनो हीं मुँह बाए खड़ी होगी

कहा कटेगी रात कहा सवेरा होगा

पहुँचेंगे घर या बीच में ही

मौत लील लेगी।

सोचता हुँ

और डर जाता हूँ मैं।