सांझ के रंगो को घूरता कहीं दूर चला आया हूं;

मन फिर ले चल मुझे वहां ;

जहां घनघोर अंधियारे में तेरी रोशनी दिखाई दे ; 

चारों ओर फैले शोर में तेरी खामोशी सुनाई दे ; 

जहां खुद को समझने की उलझन ना इतनी मजबूरी हो ;

जहां हर अधूरी आरज़ू भी मेरी पूरी हो ; 

जहां मेरे सपनों की उड़ान हों, परों में जान हो ; 

जहां मेरे हितैषी की पहचान हो भले अनजान हो ; 

सवेरे फिर वहीं चले जाएंगे रे मन; 

जहां स्वयं से एक लड़ाई लड़ता हूं ;

हार भी जाउ मगर जीवन की बढ़ाई करता हूं। 


                             'शिव'