मुख़्तलिफ़ अश्आर

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बटनों का ठिकाना नही कब टूट जाये 

अपनी अपनी सूई में धागा जरूर रखिये

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सुना है शहर अपने वजूद से तंग आ गया

मुझे तो अब गांव की फिक्र सताने लगी है

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उछलके ख़ुद भी नही पकड़ पाये

कद से बड़ी बात कर गये हैं लोग

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ऐसा भी नही था आँखों में सपनें नही थे

हाँ मिरे साथ मगर मिरे अपने नही थे 

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रस्ते के रहनुमाओं को हमदम बना लेते हैं

हम मील के पत्थरों को सनम बना लेते हैं

~बराज


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