सच को काटा झूठी सब तलवारों ने

हाल बुरा कर रक्खा है अख़बारों नें 


जो भी कश्ती डूबी है सब साहिल पर

सोच लिया खुद को मुजरिम मझधारों ने


हुआ रिहर्सल नाटक में फिर ठगने का

ओढ़ लिया है रूप नया किरदारों नें

~निमित्त निर्मूल