कि बस अब क़ैद हैं, हम भी तुम्हारी आरज़ू के

न कोई सूरज जलेगा और न तारे जमीं के

नहीं कोई हमारी आंख से अब ख़्वाब देखेंगे

नहीं देखेंगे कोई ज़ख्म अब किसी आदमी के

हम देखेंगे बस तेरा इल्म तेरी बात के दम को

न दिल को आजमाना तुम मोहब्बत की नमी से


~ बालेन्द्र शर्मा 'अनन्त'