अब गरल करूँ स्वीकार 

जियें की आस नहीं

बैरी की नहर सी बहती धार 

होती नाश नहीं

हे!शिवशंभु त्रिनेत्र को खोलो

जग जायेगी आस

यहां गंगा की हुयी मैली काया

दीखे उजला आकाश नहीं

अब गरल करूँ स्वीकार........

बालेन्द्र शर्मा