अब गरल करूँ स्वीकारजियें की आस नहींबैरी की नहर सी बहती धारहोती नाश नहींहे!शिवशंभु त्रिनेत्र को खोलोजग जायेगी आसयहां गंगा की हुयी मैली कायादीखे उजला आकाश नहींअब गरल करूँ स्वीकार........