मैं खोया था सपनों में उसकी मुस्कान लेकरके

देखकर चेहरा ख़ुशी में सो रहा था

वो कब आई धीरे कदमों से प्यार का सॉल लेकरके

इसका पता मुझको नहीं मैं तो बस खो रहा था

होगी रात की जुदाई सुबह से इस बात का अफ़सोस हो रहा था

अभी इतना ही न था ख़्वाब में,सुबह की बात कुछ यूँ थी

पिता की लात पर फ्री एक प्रश्न था

अभी तक क्यों सो रहा था

किया मेरा मन कहूँ उनसे कोई है मेरे दिल में

उसी के प्यार की चादर में लिपटा सो रहा था

पर मुझे इल्म था,

वो मेरी है नहीं और मैं उसका हो नही सकता

सो कहा.....

रात को पढ़ाई देर तक करली इसलिए सो रहा था

मैं खोया था सपनो में......

बालेन्द्र शर्मा