मजबूर है वो कागज़ 

जिसे अपने सीने पर

दिलों के ग़मों को भी 

उकेरना पड़ता है


किसी के आंसू भरे जज़्बातों 

को 

सहेजना पड़ता है

और वो इतने पत्थरदिल

जिसे महज़ कागज़ का टुकड़ा 

समझकर फेंक देते हैं


उनके गुस्से भरी मुठ्ठी में 

खुद को समेटना पड़ता है


मजबूर है वो कागज...

बालेन्द्र शर्मा