मैं शायर हूँ,
महज टूटा हुआ हूँ इश्क़ से,बाक़ी जिंदगी मेरी प्यारी हैसिसकियाँ भर रही तन्हाई अभी,बाक़ी कहानी जारी है
नज़ारे देख 'किस्मत का',हुआ ये आलम जमाने का
कहते हैं,तुम हो पागल,और तुम्हे, 'शायर' की बीमारी है
महज टूटा हुआ हूँ..........
मैं शायर हूँ,
जो सच्चे जज़्बात हैं मेरे,मीलों की दूरियां हैं उनसे
फिर भी वो साथ है मेरे
कहीं खोकर ख़्यालों में,उनके साथ चलने की बारी है
महज टूटा हुआ हूँ इश्क़ से...
मैं शायर हूँ,
वो अंजान हैं मेरी दिली गुफ्तगू से
पर अहसास तो होगा न,जब होगी खबर उसे
पागल कहेगी हँसकर,अलग अंदाज में मुझको
उसकी यही मुस्कान तो,ख्वाहिश हमारी है
महज़ टूटा हुआ हूँ इश्क़ से......
बालेन्द्र शर्मा


