मैं शहर भटकूँ या गाँव

ये धूप ओझल है

रो रही है छाँव

मैं शहर ....

तिनक श्रृंगार में डूबी किरण


उन्मुक्त होने की डगर

प्रशंशनीय वो बात है

जैसे कर्मों से बनते पाँव


मैं शहर भटकूँ....


पानी बना,नाविक नहीं

एक धार सी बहती गई

रुकता,नहीं ठहरा कहीं

ज्यों मंजिल पे ठहरे नाव

मैं शहर भटकूँ .....

यह बेला है मंगलगान की


मानो सत्य हो श्मसान सी


आविर्भाव में अभिज्ञान की


स्वयं में लीन होगा ताव


मैं शहर भटकूँ......


बालेन्द्र शर्मा