देश को सुना है मैंने विकास की एक डोर पर है
रक्त-रंजित पाँव शिथिल किसान आज भी रोड पर है
गर्मी की तपती तपन में चादर धूप की ओढ़े खड़ा है
मात्र बनके सहारा वो वोट का वो कर्ज में डूबा पड़ा है
अरे बोलते हैं दल सभी और बोलता इतिहास है
इन धरती पुत्रों का मुद्दा हर चुनावों में खास है
आरोप प्रत्यारोप की लड़ाई बड़ी जोर पर है
देश को सुना है मैंने.......
वर्षा शरद और ग्रीष्म के मौसम न उसको खल रहे हैं
बीज खाद के लिए किसान आज भी जल रहे हैं
खुद सींचते धरती लहू से तो भारत के खेत फलफुलते हैं
देश का दुर्भाग्य है यह किसान आज भी फांसी पर झूलते हैं
भव्य भारत का किसान अब पतन के दौर पर है
देश को सुना है मैंने.......
बालेन्द्र शर्मा


