जरा पूछो दहकती आग से
मुझे जलायेगी क्या
जो जल चुकी है दिलों में बदलाव की
ज्वाला
अनिल,
अनल अंगड़ाई को बुझा पाएगी क्या
हम थमे हैं,खलिहान को एक करने में
भूखे पड़े जहान को,भरपेट करने में
तुम्हे लगता तुम्हारी कौड़ियां हैं,
दाम मेहनत का
मेरे टूटे हुए अरमानों का मुआवजा
भर पाएगी क्या
जरा पूछो......
बालेन्द्र शर्मा


