तेरी ख़ूबसूरती का आलम इस कदर सिर चढ़ा है
फिर निहारने को रात को ज्यों उदित रवि खड़ा है
मैं सोचता हूँ देखकर एक सुन्दर लिखूं कहानी
बिन तारीफ़ तेरे हुस्न की,है बेकार ये जवानी
आगोश में रखना उसे ख़्वाब पत्तों की तरह है
झड़ जायँगे बेमौसम ही,वो खोयेगी जब रवानी
बालेन्द्र शर्मा


