काश अगर ऐसा होता
वो कहती छोडो बांह मेरी
हम कहते,मधुवन की छाया में
मीठी लगती यह आह तेरी
वो झुँझलाकर मेरे हांथो को
यूँ अपनी बांह छुड़ा लेती
भागी भागी कोने मधुबन के
ओझल हो खुद को छुपा लेती
मैं चिल्लाता मेरी प्रेम प्रिये
अब और नही ऐसा होगा
ये प्रेम व्यथा की चाह रही
जो न होगा ये,क्या होगा
ये बदली,चाहत के सावन की
अब और नही बरसाउंगा
पर तुम छुपकर कितनी देर रहोगी
मैं नहीं यहां से जाऊंगा
प्रियवर तुम मेरी आस नहीं
विश्वास जगाने वाली हो
बंजर यादों विरह व्यथा में
सपने भरने वाली हो
अब ह्रदय पटल की यादों से
सूरत न मिटने वाली है
यह स्पर्श तुम्हारे गालों की
होठों की पीड़ा हरने वाली है
बालेन्द्र शर्मा


