कन्या
गर्मी तपन,वर्षा थकन,
सही शीत ऋतु की तरुणाई
नव मास गर्भ के पूर्ण हुये
कोमल शिशु ने ली अंगड़ाई
वो कन्या थी शिशु का रूप लिए
हल्की सृजन सृष्टि की धूप लिए
वहां भाग्य उदय हो जाता है
घर में ज्यों पड़ती परछाई
गर्मी तपन......
तुम हो कुटुम्ब की चंचलता
विश्वास मात की अंचल का
पितु की तुम प्यारी फुलवारी
हो भाई को तुम सबसे प्यारी
तुम हो,तो खुशियों की खुशबू है
तुम बिन,बगिया बाबुल की मुरझाई
गर्मी तपन......
अब बड़ी हुयी हो जाने को
बाबुल से हाथ छुड़ाने को
माँ से झगड़ाइ छोड़ अलग
अपना संसार बसाने को
लिए स्वप्न करूँ सेवा मैं उनकी
शर्मा,बड़े ह्रदय की करे बड़ाई
गर्मी तपन......
बालेन्द्र शर्मा


