भजते रहे हम ब्रह्ममुख से,
जो सत्य,अब निस्तब्ध है
दिनकर की फैली लालिमा में,
ज्योति निस्तेज और स्तब्ध है
निस्तब्ध कीर्ति के कमण्डल,
है ध्वज पताका झुकीं हुयीं
सम्बन्ध कलुषित प्रेम जग के
कलयुग का ये प्रारब्ध है
बालेन्द्र शर्मा


भजते रहे हम ब्रह्ममुख से,
जो सत्य,अब निस्तब्ध है
दिनकर की फैली लालिमा में,
ज्योति निस्तेज और स्तब्ध है
निस्तब्ध कीर्ति के कमण्डल,
है ध्वज पताका झुकीं हुयीं
सम्बन्ध कलुषित प्रेम जग के
कलयुग का ये प्रारब्ध है
बालेन्द्र शर्मा