झरोखा है न मेरे घर में जो,
मुझको,खुद में पूर्ण करता है।
वो ठण्डी हवा का अहसास,
मन के दुःख को दूर करता है।।
मेरी प्रियतम से जो दूरी है,
तमाम रास्तों के लिए मजबूरी है।
हमारा दूरदर्शन,व्यथित अंतर्मन,
झरोखे का पुल,मन की मिटती तपन
इस झरोखे की खास बात,
मन को बताना जरूरी है।।
उनसे दूर होकर भी हमारी,
ख़्वाहिश झरोखे से पूरी है।
मैं सुन सकता हूँ कानों में,
कुछ गाती हवाएँ रोशनदानों में
हम मिल लेंगे इन्हीं झरोखों से,
यहीं से दिल की कहानी पूरी है।।
बालेन्द्र शर्मा

