क्यों न लिख दूँ किसी लिबास से,जा खींच ला मुझे

मेरे भारत की हैवानियत मुझे,जीने नही देती

ये चीथड़ों के टुकड़े जो हुए,जार जार से

ये माँ भारती के वस्त्र हैं ,या वतन के दुलार के

अब दोहरी हुयी है प्रकृति,मानव विचार की

कोई बचालो आबरू,द्रोपदी के मान की

हुयी भीष्म यह समस्या,जिसका भीष्म है अभिमान

बढ़ रहा परिदृश्य जिसका,इक्षामृत्यु के समान

क्यों न धर्म, जाति, मजहबों को,आपस में जोड़ लें

इस बढ़ते हुए परिदृश्य का,खुद अंतिम निचोड़ लें

ये सत्ता के सिंघासन,न किसीके काम आयेंगे

जो पड़ी होगी तेरी मैय्यत,तो इंसानित और इंसान आयेंगे

                 

बालेन्द्र शर्मा