हम हुए यूँ गुम की रश्ता ख़ोज न पायेथी इतनी दोस्तों की भीड़ जो बोझ बन जायेफिर याद आये बस फ़क़त दो चार मेरे यारयह दोस्ती की विरासत न जमींदोज हो जाये
हम हुए यूँ गुम की रश्ता ख़ोज न पायेथी इतनी दोस्तों की भीड़ जो बोझ बन जाये
फिर याद आये बस फ़क़त दो चार मेरे यारयह दोस्ती की विरासत न जमींदोज हो जाये