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दोस्त


हम हुए यूँ गुम की रश्ता ख़ोज न पायेथी इतनी दोस्तों की भीड़ जो बोझ बन जाये

फिर याद आये बस फ़क़त दो चार मेरे यारयह दोस्ती की विरासत न जमींदोज हो जाये

— बालेन्द्र शर्मा
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