मैं लिखूं क्या इस वास्ते
जहां हैवानियत भी धरम बन गया
उस कौम का क्या धर्म है
जहां इंसानियत तड़पती रही
और इंसान मर गया
कोई अब्र से छीन लाये
मेरे भारत की खुशियाँ
जन्नत-ए-जहां का वतन
जहन्नुम सा बन गया
मैं लिखूं क्या इस वास्ते......
अभी निकली ही थी वो
छोटी सी किरण बनकरके
पापा पुकारा करती थी
बड़ी मुस्कान से तुतलाकरके
अंजुमन में घूमती
प्यारी लली केहलाती है
लली के ललाट पर
दुलार दुनिया लुटाती है
लेकिन कोई इंसानियत में
आज हैवान बन गया
मैं लिखूं क्या इस वास्ते......
बालेंद्र शर्मा


