मेरा हौसला बुलंद है
पर सांस मेरी बंद है
इस खुले हुए गगन में
उड़ सकूं तो कुछ कहूं

मैं नीड़ अपना बुन लूंगी
डांट सबकी सुन लूंगी
मुझे आस इस धरा पे
कुछ दिन और मैं रहूं

मैं दाना महज चुनकरके
चह चह की धुनकरके
एक राग मन का छेड़
मन को शांत कर सकूं

~बालेंद्र शर्मा "अनंत"