मुझे आलोचना तेरी बड़ी ही क्षुब्ध करती है
सुनकर मेरे मन में ये खुद से युद्ध करती है
समय के इस पटल पर सत्य अब निस्तेज है
छुपाने की अदा तेरी बड़ा ही क्रुद्ध करती है
बालेन्द्र शर्मा


मुझे आलोचना तेरी बड़ी ही क्षुब्ध करती है
सुनकर मेरे मन में ये खुद से युद्ध करती है
समय के इस पटल पर सत्य अब निस्तेज है
छुपाने की अदा तेरी बड़ा ही क्रुद्ध करती है
बालेन्द्र शर्मा