आख़िर तुम्हे भी शौक है
अंजान होने का
भटकती रूह की इस भीड़ में
बेजान होने का
जरा सी शैर कर लो ख़्वाब की
मेरी मोहोब्बत में
लेकर चलूँगा इंतज़ार कर
बस शाम होने का
बालेन्द्र शर्मा


आख़िर तुम्हे भी शौक है
अंजान होने का
भटकती रूह की इस भीड़ में
बेजान होने का
जरा सी शैर कर लो ख़्वाब की
मेरी मोहोब्बत में
लेकर चलूँगा इंतज़ार कर
बस शाम होने का
बालेन्द्र शर्मा