आओ प्रोमिस करते हैं

छली हुयी अंतर्मन बातों की

तेल दिए में भरते हैं

आओ प्रोमिस करते हैं

ठगी करी जो खुदसे खुदकी

लक्ष्य की धार अधर में लटकी

दिशा फेंक ज्योति नयनों में

छूटा पूरा करते हैं

आओ प्रोमिश करते हैं

वो बहन भी है और माँ भी घर में

भ्रातृ पितृ के स्नेह समर में

जो किया था वादा खुदसे तुमने

उसको पूरा करते हैं

आओ प्रोमिस करते हैं

कई दीवाली होली सूनी

मलें ज्ञान की खाली धूनी

अब कठिन परिश्रम की स्याही से

रंग जीवन में भरते हैं

आओ प्रोमिस करते हैं

आओ प्रोमिस करते हैं

~बालेन्द्र शर्मा