देखना जानना ही है।
उड़ती, कटती, लड़ती, झगड़ती।
चित्र चित्रों वाली पतंगों को।
वो तीन रुपए की पतंग है,
वो तीनों कालों में आंनद को, विषाद को दूर से ही देखती है।
वो खुशियाँ बढ़ाती है, दुख बांटती है।
अपने हक़दार का सहारा बनती है।
मेरी पतंग जीत के; हार के ढोंग से दूर रहती है, वो निज घर रहती है।
उड़ती पतंग को नहीं पता
वो कब कट जाएगी,
कटी पतंग को नहीं पता
वो कब उड़ जाएगी।
वह तो बस धागे का खेल देखती जाती है,
इन पतंगों का धागा भी सिसकियां ले रहा है।
पतंगों के चित्र उसे प्रेरित कर रहे हैं,
तुम पतंग की तरह बस जानों देखो।
बस देखते रहो!


