सुबह का सपना देख
झटपटा कर मेरी नींद खुली,
कल रात सोचकर जो सोई थीं,
सुबह समय वह ६ उठी।
उठी तो एक दृश्य
वही घबराहट, सीने का भारीपन, गुमनाम दुनियां से निकल रही वही लड़की,
फ़िर-फ़िर दुनिया से विद कर,
अपनी निज दुनिया जाती सी लड़की,
हरा रही ये दुनिया पग पग।
फ़िर उठ उड़ जाना चाहे
मोती, घुघरू रास न आए
खुदको वो असहाय पाए
पुरुषार्थ तिंकृत फिर बजाए,
उजडे से घर को देखे जाए।
काली रात मौन भारी है,
सुबह उजाला धौन भरी है।
जहां भी जाए खुदको पाए,
ये देख कर तितिक्ष हो जाए।
मौन दुनिया में गूंज भर आए,
प्रज्ञा का सागर बन जाए।
ध्रुव सम ध्रड़ता आ जाए,
ध्रुवी हूं मैं, कहती जाए।
शब्दमलेक्षता दूर भगाए,
फिर मौन सागर सम गुम जाए।
जगत सिरा से फिर सिर जाए...


