#Lockdown
सृजन का उद्वेग अब शांत हो गया ।
था किया प्रकृति से छेड़छाड़ अब शांत हो गया ।
तुम अविष्कार पर इतराए थे ।
परमाणु बम ले गुर्राए थे ।
ऊर्जा का दोहन भरपूर किया ।
बच्चे को भी माँ से दूर किया अब शांत हो गया ।
किया प्रकृति से छेड़छाड़ अब शांत हो गया ।
मिट्टी की खुशबू अब दुर्गंध हुई।
नदियों में नालों सी गंध हुई ।
प्राण वायु में ज़हर घोल दिया ।
हरी रही न पृथ्वी अब तू शान्त हो गया।
सृजन का उद्वेग अब शांत हो गया ।
किया प्रकृति से छेड़छाड़ अब शांत हो गया ।
अब घर बैठ कर कुछ विचार कर ।
प्रकृति के लिए कुछ काम कर ।
घर बैठ देख कोरोना का अंत हो गया।
सृजन का उद्वेग अब शांत हो गया ।
सृजन का उद्वेग अब शांत हो गया ।
- बाबू प्रेम अमर


