यही कुछ दोपहर के 1 बजे थे

मैं खड़ा था इंतजार में उसके

नीम के पेड़ के नीचे

कुछ गुमसुम सा उदास सा

उसी की सोच में गमगीन सा

तभी इक नन्हा परिंदा

उड़ कर पास आ बैठा

उसने शायद देखा मुझको

मैं सोच मे यूँ ही खड़ा था

गर्म हवा के कुछ थपेडे

उसको भी झकझोरते थे

उसको ये अहसास था

मुझे किसी का इंतजार था।

खामोशी को तोडते थे

फडफडाते पंख उसके

जब तक मैंने उसको देखा

उड़ बांह में मेरी आ बैठा

नन्हे परिंदे के नन्हे पंजे

देह मे कुछ चुभ से गए थे

जैसे मेरी खामोशी के

कुछ क्षण चुभ से गए थे ।

प्यार से पीठ पर हाथ फेरा

था चारों ओर उंगलियो का घेरा

खेल रहा था वो अब ऐसे

जानता हो मुझको जैसे

कोसों दूर दर्द ले जा रही थी

उसके पंजो की हर इक चुभन

अब जाने का समय था मेरा

शायद यही था उसका मन

लेकर सारा दर्द मेरा

नीम की डाल जा बैठा

आज इक नन्हा परिंदा

उडकर पास मेरे आ बैठा ।

                  बाबू प्रेम अमर